"देखिये तो सही, यह विशुद्ध भारतीय रेल, जिसमें सफर करने में निकल गया बड़े-बड़ों का तेल | आज तो इस पर प्रभु सुरेश जी की छाया है-या कि लगता है अनजाने असुरेश की ही सब माया है, पर मैं जब से इस रेल को देख रहा हूँ-तेल की धार को और तेल को देख रहा हूँ, राजनीतिक खिलाड़ियों के फरेबी खेल को देख रहा हूँ, किराया चलीस गुना, धकापेल को देख रहा हूँ | आरंभिक जीवन के बीस वर्ष बाद सन १९८१ के मई या जून महीने में रेल का पहला सफर शुरू किया था और तब से आज तक भीड़ निरंतर बढ़ती ही गयी है-रेल की छतों पर यात्रा करने वाले लोग, डिब्बों के खुले जोड़ पर पैर टिकाकर सफर करने वाले लोग-भेड़-बकरियों की तरह ठुँसे हुए या लारियों पर गाय-बैलों की तरह लदे हुए लोग, हलाल किये जाने वाले मुर्गे-बत्तखों की तरह लटके हुए लोग-ये सबके सब भारतीय रेल के यात्री हैं, कभी भी किसी घटना-दुर्घटना का शिकार बनने को अभिशप्त, प्रत्येक पाँचवे वर्ष और कभी-कभी मध्यावधि में भी अपने कीमती वोटों से निज भाग्य-विधाताओं की सरकार बनाते हैं और सत्ता के प्रशिक्षित मक्कार मंत्रियों के आश्वासन पर शवासन साधे चुपचाप पड़े रहते हैं | सन 1981 में जौनपुर से लखनऊ और फिर लखनऊ से सहारनपुर की पहली उस यात्रा में अपने मित्र के साथ कई ट्रेनों को मैंने इसलिए छोड़ दिया की उन डिब्बों में घुस पाने की नौबत ही नहीं बन पायी | उसके बाद की कई यात्राएँ जौनपुर से हरिद्वार तक मैंने या तो खड़े होकर की या बेसुध की दशा में फर्श पर पड़े-पड़े-लोगों के पैरों की ठोकरें खाते हुए | गाँव के इस भुच्चड़ देहाती के पास दीन विनम्रता के अलावा कोई ऐसी योग्यता नहीं, जो यात्रा के दौरान काम आती | फिर धीरे-धीरे बोलना सीख लिया, जहाँ जैसी पड़े, बातें बनाना, गप्पें हाँकना और मौक़ा मिलने पर कुछ को शागिर्द बनाना भी सीख गया, पर ईमान की बात यह कि विनम्र चतुराई के मन्त्र भी सदैव कारगर नहीं साबित हो सकते |
अपनी कुछ रचनाओं के प्रकाशन के सन्दर्भ इधर विगत ६ नवम्बर 2015 को दिल्ली की यात्रा आरम्भ की तो मैं पूरी उमंग में था, लेकिन 'सद्भावना' ने अपनी दुर्भावना का परिचय पहले ही दे दिया था-लगभग तीन घंटे विलम्ब से पहुँची ट्रेन ने अपने चारित्रिक लांछन से मेरे मन को बेचैन कर दिया, लेकिन जैसे चुनाव बहुधा बेचारी जनता के पास कोई विकल्प नहीं दिखायी देता और वह दुविधा में फँसी रहती है कि किसे चुने और किसे चूने, मैं भी 'व्याकुल भारत' बना हुआ था | मेरे पास चुनने और चूनने( चूना लगाने या नोटा का बटन दबाने) के विकल्प का सवाल कहाँ था? उम्र का डूबता हुआ सूरज और उस पार पहुँचाने वाली जो भी नाव मिल जाय, उसी पर सवार हो जाने की स्थिति में किसी तरह अपनी निर्धारित जगह मिल गयी थी-शयनयान इस-9 में सीट नंबर-४-एकदम नीचे की सीट | abaapki सीट bhale ही आरक्षित हो, प्रतिदिन ghar से दूर नौकरी बजाने वाले बेकाबू बाबुओं, छूटा घूमते घंट बाबाओं और बे-टिकट-बाटिकट चलने वाले जनरल बोगी के हेकड़ यात्री-गदह पचीसी के रंगरूटों तथा नारेबाजी-नारीबाजी में मशगूल उभरती रेख वाले पट्ठों-'विद्या-रथियों' से पटी हुई सीटों पर दिन के समय आप दोयम दर्जे के ही नागरिक ठहराए जा सकते हैं, बैठे-बैठे कमर में दर्द हो गया, काफी देर बाद अपनी ही सीट पर लेट पाने की सहूलियत मिली | बीच वाली सीट को उपयोगी स्थिति में टाँगने वाली सीकड़ इतनी ढीली की काफी समय तक उसके गिर जाने का डर बना रहा ज़ेहन में | समझ में नहीं आया कि यह रेलगाड़ी है या बैलगाड़ी, जो जब जहाँ चाहे 'नाथ' पकड़कर बैल के आगे खड़ा हो जाय | अब इसे 'चेन-पुलिंग' समझिये या 'चैन-पुलिंग' |
'सद्भावना' नाम की इस दुश्चरित्र ट्रेन के दिल्ली पहुँचने का समय सुबह के लगभग साधी-चार या पाँच बजे और इसने हमारे धीरज और धी-रज(बुद्धि-कण, निर्णय लेने की क्षमता), दोनों को बैगन का भुर्ता बनाकर छोड़ दिया-लखनऊ पहुँचने में ही लगा कि ननिहाल की दूरी नौ सौ कोस की | अखबार में पढ़ा था कि ट्रेनों में पानी की जो बोतलें सप्लाई की जाती हैं, उसमें करोड़ों का घोटाला हुआ है, यात्रियों को शुद्धता के मानक पर जो पानी पिलाने के लिए अनुमन्य है, उस 'रेल-नीर' का तो पता नहीं, पर किसिम-किसिम की बोतलें दिखायी दे रही है,अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों के साथ दिव्यता के लोक में विचरण कराने वाला गुटखा-युवा प्राणों की 'पुकार' की विक्री जोरों पर है, सरकारी तौर पर यह प्रतिबंधित है, लेकिन 'तरकारी' (नीचे से छिपाकर कार्यान्वित होने वाली) तौर पर भलीभाँति अनुबंधित, उपस्थित है यह कैंसर की प्रेम-पुड़िया |
[ ज़िंदगी के साथ अपनी मौत भी सफर में है(यात्रा-संस्मरण)-अमलदार 'नीहार' ]
२७ अक्टूबर, २०१७