गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

नयनों में 'नीहार' भरा है

भजूँ सूर-मन कृष्न कन्हैया, वही चराये मेरी गैया,
छपक ताल उच्छल जल, खेलूँ सँग कान्हा, ज्यों देखे मैया। 
कोकिल-विद्यापति बन गाऊँ, शंकर बन हरिदास रिझाऊँ,
दण्डी-सा लालित्य मिले माँ! और माघ-सा मैं बन जाऊँ।।
वाणी-नन्द निराला हूँ मैं, कहीं-कहीं मधुशाला हूँ मैं,
पिया-न जीवन भर जो उतरे, हालाहल का प्याला हूँ मैं।
कुछ तुलसी हूँ, कुछ कबीर हूँ, मीरा की भी प्रीति-पीर हूँ,
कालिदास की जूठन खायी, लोकदर्द गाकर नज़ीर हूँ।।
घनानन्द-सा प्रेम-पपीहा, छोड़ूँ क्यों ठाकुर का ठीहा?
देव और मतिराम-बिहारी, छन्द रचूँ रमणीय समीहा।
कुछ प्रसाद हूँ, पन्त तनिक-सा, महादेवि-उर- अन्तस विकसा।
दिनकर-नागार्जुन या धूमिल, मन किसान केदारी सरसा।।
भाषा की तलवार दुधारी-कुछ केशव, आचार्य भिखारी,
मुक्तिबोध, कुछ सर्वेश्वर भी, बच्चन-नीरज से भी यारी।
नारी-मन की पीर पिरोयी, दलित-दंश लख कविता रोयी,
वारवधू-सी राजनीति यह, फिर भी भारत -जनता सोयी।।
बाहु उठाये व्यास न कोई, प्राचेतस का दास न कोई,
मेरी बातें कौन सुनेगा, शासन-तिमिर प्रकाश न कोई।
मन में अमित दुलार भरा है, माँ के मन में प्यार भरा है।
सजग भारती का सुत होकर नयनों में 'नीहार' भरा है।।
रचनाकाल : १५ अगस्त २०१७
[ हृदय के खण्डहर- अमलदार 'नीहार'
११ अक्टूबर २०१८

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